पटना न्यूज डेस्क: केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण (कैट) की पटना बेंच ने बिहार कैडर के आईपीएस अधिकारी आदित्य कुमार के खिलाफ चल रही विभागीय जांच रद्द करने से इनकार कर दिया है। उन पर पटना हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश के नाम पर किसी व्यक्ति द्वारा फर्जी पहचान बनाकर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को प्रभावित करने की साजिश में शामिल होने का आरोप है। इस मामले में आदित्य कुमार ने विभागीय कार्रवाई को चुनौती दी थी।
न्यायिक सदस्य जस्टिस नरेंद्र कुमार जोहरी और प्रशासनिक सदस्य कुमार राजेश चंद्र की बेंच ने कहा कि किसी मामले में आपराधिक मुकदमा चलने का मतलब यह नहीं है कि सरकार संबंधित अधिकारी के खिलाफ अलग से विभागीय जांच नहीं कर सकती। कैट ने आदित्य कुमार के इस दावे को भी खारिज कर दिया कि निलंबन बढ़ाने के आदेशों को प्रक्रियागत कमियों के कारण अमान्य ठहराए जाने के तुरंत बाद विभागीय कार्रवाई शुरू करना दुर्भावना से प्रेरित था।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला अक्टूबर 2022 में बिहार आर्थिक अपराध इकाई की ओर से दर्ज एफआईआर से जुड़ा है। राज्य सरकार के मुताबिक, एक व्यक्ति ने पटना हाई कोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश बनकर फोन और व्हाट्सऐप के जरिए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) समेत वरिष्ठ अधिकारियों से संपर्क किया था। आरोप है कि ऐसा एक वरिष्ठ अधिकारी के पक्ष में प्रशासनिक फैसले करवाने के लिए किया गया। इस मामले में आदित्य कुमार को आरोपी बनाया गया और 18 अक्टूबर 2022 को निलंबित कर दिया गया।
आदित्य कुमार ने दिसंबर 2023 में आपराधिक अदालत के सामने आत्मसमर्पण किया था। इसके बाद अप्रैल 2024 में उन्हें जमानत मिल गई। मार्च 2025 में कैट ने उनके निलंबन को 17 अक्टूबर 2023 के बाद बढ़ाने के आदेशों को अमान्य करार दिया था। न्यायाधिकरण ने कहा था कि सरकार ने इसके लिए तय कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया था। इस फैसले के पांच दिन बाद सरकार ने आदित्य कुमार के खिलाफ आरोप पत्र जारी कर विभागीय जांच शुरू कर दी।
आदित्य कुमार ने कार्रवाई को बताया था परेशान करने की कोशिश
आदित्य कुमार ने कैट में दलील दी कि विभागीय कार्रवाई शुरू करने में दो साल से ज्यादा की देरी हुई। उनका आरोप था कि यह कदम उन्हें परेशान करने और पुलिस उपमहानिरीक्षक (डीआईजी) के पद पर प्रमोशन से रोकने के लिए उठाया गया। उन्होंने यह भी कहा कि निलंबन बढ़ाने के आदेशों को अमान्य घोषित किए जाने के तुरंत बाद आरोप पत्र जारी करना सरकार की दुर्भावना दिखाता है।
हालांकि, न्यायाधिकरण ने पाया कि सरकार दिसंबर 2022 से ही उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू करने पर विचार कर रही थी। यह प्रक्रिया निलंबन बढ़ाने के आदेशों को चुनौती देने पर उन्हें राहत मिलने से काफी पहले शुरू हो गई थी। कैट ने कहा कि विभागीय कार्रवाई शुरू होने और निलंबन बढ़ाने के आदेशों को अमान्य घोषित किए जाने के बीच कम समय का अंतर अपने आप में दुर्भावना साबित नहीं करता।
न्यायाधिकरण ने माना कि कार्रवाई पूरी करने में हुई देरी पर सरकार से जवाब मांगा जा सकता है। लेकिन फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि आरोप पत्र सिर्फ इसलिए जारी किया गया था, क्योंकि आदित्य कुमार ने न्यायाधिकरण का दरवाजा खटखटाया था।
आपराधिक केस और विभागीय जांच के नियम अलग
कैट ने यह भी साफ किया कि आपराधिक मुकदमा और विभागीय जांच अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं और दोनों में सबूतों को परखने के मानक भी अलग होते हैं। आपराधिक मामले में आरोप साबित करने के लिए संदेह से परे सबूत जरूरी होते हैं, जबकि विभागीय जांच में संभावनाओं के आधार पर फैसला लिया जाता है।
न्यायाधिकरण ने यह भी बताया कि आदित्य कुमार के खिलाफ विभागीय आरोपों में से एक निलंबन के दौरान तय मुख्यालय से कथित तौर पर बिना अनुमति अनुपस्थित रहने से जुड़ा है।
छह महीने में जांच पूरी करने का निर्देश
कैट ने विभागीय जांच जारी रखने की अनुमति दी, लेकिन साथ ही मामले की लंबी अवधि पर चिंता भी जताई। न्यायाधिकरण ने सरकार से कोशिश करने को कहा कि जांच अगले छह महीने के भीतर पूरी कर ली जाए। उसने यह भी स्पष्ट किया कि इस आदेश में आदित्य कुमार के खिलाफ लगाए गए आरोपों की सच्चाई पर कोई राय नहीं दी गई है।
इस मामले में आदित्य कुमार की ओर से अधिवक्ता एमपी दीक्षित पेश हुए। वहीं, सरकारी पक्ष की ओर से अधिवक्ता टीएन ठाकुर, सर्वदेव सिंह, एके शर्मा और संजय कुमार ने पैरवी की।