पटना न्यूज डेस्क: पटना हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि कोई व्यक्ति सिर्फ इसलिए आपराधिक मानहानि का केस दर्ज नहीं करा सकता, क्योंकि वह उस व्यक्ति का भक्त या अनुयायी है, जिसकी कथित तौर पर मानहानि हुई है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 199(1) के तहत मानहानि की शिकायत वही व्यक्ति दर्ज करा सकता है, जो कथित अपराध से सीधे प्रभावित हुआ हो। किसी के प्रति निजी भावनाएं या जुड़ाव इस कानूनी शर्त को पूरा नहीं करते।
जस्टिस आलोक कुमार सिन्हा की एकल पीठ ने स्वामी रामदेव की जीवनी गॉडमैन टू टाइकून: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ स्वामी रामदेव के प्रकाशक जगरनॉट बुक्स प्राइवेट लिमिटेड के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्रवाई रद्द कर दी। यह मामला स्वामी रामदेव के एक अनुयायी की शिकायत पर शुरू हुआ था। अमित कुमार ने 6 सितंबर 2017 को वैशाली के हाजीपुर स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में शिकायत दर्ज कराई थी। उसका कहना था कि उसने 1 सितंबर 2017 को किताब खरीदी थी। कवर पर स्वामी रामदेव की तस्वीर देखकर उसने किताब पढ़ी तो उसमें कुछ बातें उन्हें बदनाम करने वाली लगीं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि किताब में गुरु शंकरानंद, स्वामी योगानंद और राजीव दीक्षित की मौत के लिए अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी रामदेव को जिम्मेदार बताया गया है। साथ ही, उनके चित्रण और भगवा कपड़े पहनने से जुड़े जिक्र से हिंदू धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं।
शिकायतकर्ता और दो गवाहों के बयान दर्ज करने के बाद मजिस्ट्रेट ने 7 और 9 अक्टूबर 2017 को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 295-ए, 500, 501 और 502 के तहत संज्ञान लिया था। इन आदेशों को चुनौती देते हुए जगरनॉट बुक्स ने सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट का रुख किया। प्रकाशक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता आशीष गिरी ने दलील दी कि शिकायत कानूनी रूप से मान्य नहीं है, क्योंकि किताब में लगाए गए कथित आरोप स्वामी रामदेव से जुड़े थे, न कि शिकायतकर्ता से। उन्होंने कहा कि धारा 199(1) के तहत मानहानि का मामला वही व्यक्ति दर्ज करा सकता है, जिसकी खुद मानहानि हुई हो।
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 199(1) में इस्तेमाल किया गया 'प्रभावित व्यक्ति' शब्द कानूनी रूप से जरूरी शर्त है, महज औपचारिकता नहीं। कोर्ट ने साफ कहा कि कोई व्यक्ति सिर्फ स्वामी रामदेव का शिष्य या अनुयायी होने के आधार पर उनकी जगह शिकायत दर्ज नहीं करा सकता। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने यह भी कहा कि किसी स्पष्ट और पहचान योग्य समूह के खिलाफ मानहानि की बात कही गई हो, तो उस समूह का सदस्य शिकायत कर सकता है। लेकिन इस मामले में किताब की बातें स्वामी रामदेव से जुड़ी थीं। शिकायतकर्ता ने यह नहीं बताया कि किताब में उसके अपने चरित्र, व्यवहार या प्रतिष्ठा को लेकर कुछ कहा गया है। कोर्ट ने माना कि सिर्फ यह दावा करना कि स्वामी रामदेव के कई अनुयायियों की भावनाएं आहत हुई हैं, उन्हें कानून के तहत कोई स्पष्ट और पहचान योग्य समूह नहीं बना देता। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मजिस्ट्रेट के दोनों आदेश रद्द कर दिए और जगरनॉट बुक्स के खिलाफ चल रही सभी संबंधित कार्यवाही खत्म कर दी।