पटना न्यूज डेस्क: पटना हाई कोर्ट ने 2005 के मारपीट मामले में एक सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी और एक वकील की दोषसिद्धि को बरकरार रखा है। अदालत ने ट्रायल कोर्ट के वर्ष 2014 के फैसले को सही ठहराते हुए सेवानिवृत्त न्यायिक अधिकारी योगेंद्र राम, अधिवक्ता बिनोद कुमार और उनके परिवार के दो अन्य सदस्यों को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 323 सहपठित धारा 34 के तहत दोषी माना। हालांकि, कोर्ट ने उनकी सजा घटाकर पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दी।
यह मामला जमीन विवाद और दोनों पक्षों के बीच पहले से चल रही कानूनी लड़ाई से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 27 फरवरी 2005 की सुबह राहुल कुमार शौच से लौट रहे थे, तभी अधिवक्ता बिनोद कुमार ने कथित तौर पर उन पर लोहे की खंती से हमला किया। इसके बाद योगेंद्र राम ने लाठी से उनके सिर पर वार किया। आरोप था कि राहुल की सोने की चेन भी छीनी गई और उन्हें दोबारा पीटा गया। बीच-बचाव करने पहुंचीं राहुल की मां पर भी कथित तौर पर हमला किया गया।
जांच के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ हत्या के प्रयास, चोरी और हथियार से चोट पहुंचाने समेत कई धाराओं में आरोपपत्र दाखिल किया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने पर्याप्त साक्ष्य न मिलने पर केवल धारा 323/34 आईपीसी के तहत स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के अपराध में दोषी ठहराया था और उन्हें परिवीक्षा अधिनियम के तहत निजी मुचलके पर रिहा कर दिया था।
हाई कोर्ट में आरोपियों ने दावा किया कि मामला पुरानी रंजिश और गांव की राजनीति का परिणाम है तथा गवाहों के बयानों में विरोधाभास है। लेकिन अदालत ने इन दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि घायल व्यक्ति की गवाही विश्वसनीय है और केवल पुरानी दुश्मनी के आधार पर उसे खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि हत्या के प्रयास और लूट के आरोप संदेह से परे साबित नहीं हुए, लेकिन यह पर्याप्त रूप से साबित हुआ कि आरोपियों ने साझा मंशा के तहत राहुल कुमार और उनकी मां को चोट पहुंचाई थी। इसी आधार पर दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया गया।