पटना न्यूज डेस्क: 5 अक्टूबर 2000 की रात करीब 9 बजे समस्तीपुर के बोरितार पुल के पास गोली चलने की आवाज से इलाके में हड़कंप मच गया था। अभियोजन के मुताबिक, गोली चलने की आवाज सुनकर चंद्र कुमार झा टॉर्च लेकर मौके की तरफ दौड़े। उनका दावा था कि उन्होंने रंजीत कुमार झा को अपने भाई पवन कुमार झा पर गोली चलाते देखा। इसके बाद रंजीत दो अन्य लोगों के साथ वहां से भाग गया। मौके पर पवन खून से लथपथ हालत में मिला था और उसके पास एक पिस्तौल भी पड़ी होने की बात कही गई थी।
इस मामले में 2009 में रंजीत कुमार झा को हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत दोषी ठहराया गया था। मामला करीब 25 साल से ज्यादा समय तक कानूनी प्रक्रिया में चलता रहा। अब पटना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस पुराने फैसले को पलट दिया है। जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस कुमार मनीष की बेंच ने 10 सितंबर को दिए फैसले में रंजीत की दोषसिद्धि रद्द कर दी।
हाईकोर्ट ने मामले में पेश किए गए सबूतों और गवाही की समीक्षा करने के बाद माना कि इस आधार पर हत्या का दोष सुरक्षित तरीके से साबित नहीं किया जा सकता। अदालत के मुताबिक, अभियोजन की कहानी आरोपी को दोषी ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं थी। कोर्ट ने साफ कहा कि यह मामला आखिरकार आरोपी के खिलाफ “कोई सबूत नहीं” होने की स्थिति तक पहुंचता है।
इस फैसले के साथ हाईकोर्ट ने रंजीत कुमार झा को आईपीसी की धारा 302 और आर्म्स एक्ट के तहत मिली सजा को रद्द कर दिया। यानी 25 साल से ज्यादा पुराने इस हत्या मामले में निचली अदालत का 2009 का दोषसिद्धि आदेश अब कायम नहीं रहा। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने को सुरक्षित नहीं माना।