पटना न्यूज डेस्क: पटना हाईकोर्ट ने जबरन वसूली के एक मामले में आरोपी मेनुद्दीन मंसूरी की नई अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। जस्टिस जितेंद्र कुमार की अदालत ने कहा कि जब कोई आरोपी पहले ही निचली अदालत में सरेंडर कर चुका हो, जमानत की शर्तें पूरी कर रिहा हो गया हो, तो उसे अदालत की कानूनी निगरानी में माना जाता है। ऐसी स्थिति में दोबारा अग्रिम जमानत मांगना कानूनन स्वीकार्य नहीं है। हालांकि, कोर्ट ने आरोपी को दो हफ्ते के भीतर निचली अदालत में सरेंडर कर नियमित जमानत के लिए आवेदन देने की छूट दी है। साथ ही निचली अदालत को आवेदन दाखिल होने वाले दिन ही उस पर विचार करने का निर्देश दिया है।
पहले मिली थी अग्रिम जमानत
यह मामला सारण जिले के गौरा थाना कांड संख्या 54/2024 से जुड़ा है, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 384 के तहत जबरन वसूली का मामला दर्ज किया गया था। हाईकोर्ट ने 2 अप्रैल 2025 को मेनुद्दीन मंसूरी को अग्रिम जमानत दी थी। उस आदेश में यह शर्त थी कि अगर आरोपी ने अपने पुराने आपराधिक मामलों की जानकारी जानबूझकर छिपाई होगी, तो उसका जमानत बांड रद्द किया जा सकता है। रिकॉर्ड के मुताबिक, उसके खिलाफ पहले के तीन आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से शिकायत मामला संख्या 2274/2021 का जिक्र पिछली जमानत अर्जी में गलती से छूट गया था। इसके बाद निचली अदालत ने उसका जमानत बांड रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी कर दिया।
दोबारा अग्रिम जमानत की मांग पर क्या दलीलें दी गईं?
मेनुद्दीन के वकील ने अदालत में कहा कि पुराने मामले का जिक्र जानबूझकर नहीं, बल्कि अनजाने में छूट गया था। उन्होंने यह भी दलील दी कि आरोपी सरकारी कर्मचारी है और गिरफ्तारी से उसकी नौकरी पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की ओर से याचिका का विरोध किया गया। उनका कहना था कि आरोपी पहले ही निचली अदालत में सरेंडर कर चुका था, जमानत बांड जमा करने के बाद रिहा भी हो गया था। ऐसे में वह अदालत की कानूनी निगरानी में था और दोबारा अग्रिम जमानत नहीं मांग सकता था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का भी दिया हवाला
जस्टिस जितेंद्र कुमार ने राज्य सरकार और शिकायतकर्ता की दलीलों को स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला दिया। इनमें मनीष जैन बनाम हरियाणा राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और सुनील फुलचंद शाह बनाम भारत संघ जैसे मामले शामिल थे। अदालत ने निरंजन सिंह बनाम प्रभाकर राजाराम खारोटे के फैसले का भी उल्लेख किया, जिसमें अदालत के अधिकार क्षेत्र के सामने पेश होने और हिरासत की कानूनी स्थिति को समझाया गया है। हाईकोर्ट ने इसी आधार पर कहा कि पहले सरेंडर कर जमानत पर रिहा हो चुके आरोपी की नई अग्रिम जमानत याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।
नियमित जमानत के लिए आवेदन देने की छूट
हाईकोर्ट ने मेनुद्दीन मंसूरी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी, लेकिन उसे राहत के लिए निचली अदालत जाने का रास्ता दिया। आरोपी को दो हफ्ते के भीतर सरेंडर कर नियमित जमानत की अर्जी दाखिल करनी होगी। निचली अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह आवेदन मिलने के दिन ही उस पर विचार करे।
केस डिटेल्स
मामला: मेनुद्दीन मंसूरी बनाम बिहार राज्य
केस नंबर: क्रिमिनल मिसलेनियस नंबर 41585/2026
पीठ: जस्टिस जितेंद्र कुमार
फैसले की तारीख: 25 सितंबर 2026