पटना न्यूज डेस्क: पटना हाईकोर्ट ने पत्नी पर तलाक और बच्चों की कस्टडी से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का दबाव बनाने के आरोप में दर्ज आपराधिक मामला रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि केवल तलाक या कस्टडी के लिए सहमति देने का दबाव बनाना भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के तहत 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता।
यह मामला गांधी मैदान थाने में दर्ज एक एफआईआर से जुड़ा था। पत्नी ने पति के खिलाफ बीएनएस की धारा 85 (क्रूरता) समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज कराया था। आरोप था कि जनवरी 2026 में पटना के होटल मौर्या में हुई मुलाकात के दौरान पति ने तलाक और दोनों बेटियों की कस्टडी से जुड़े दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए दबाव बनाया। पत्नी ने मारपीट और जान से मारने की धमकी देने का आरोप भी लगाया था।
पति ने हाईकोर्ट में कहा कि दोनों के बीच सितंबर 2025 में मध्यस्थता के जरिए समझौता हो चुका था और पहले दर्ज मामले वापस ले लिए गए थे। उनके अनुसार, नया विवाद केवल तलाक और बच्चों की कस्टडी की शर्तों को लेकर पैदा हुआ था।
न्यायमूर्ति प्रवीण कुमार ने कहा कि पत्नी के अपने बयान के अनुसार सितंबर 2025 के समझौते के बाद वर्ष के अंत तक दोनों के संबंध सामान्य थे। इसलिए अदालत ने केवल जनवरी 2026 की घटना पर विचार किया।
अदालत ने कहा कि तलाक और कस्टडी की शर्तों पर सहमति बनाने का प्रयास वैवाहिक विवाद का हिस्सा हो सकता है, लेकिन इसे अपने आप में क्रूरता नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसा कोई आरोप नहीं है कि पति ने संपत्ति या कीमती सामान की मांग की हो, जो धारा 85 के दायरे में आता हो।
हाईकोर्ट ने गलत तरीके से बंधक बनाए जाने के आरोप को भी स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि पत्नी के शुरुआती बयान के अनुसार वह खुद डर के कारण कमरे में बंद हो गई थीं और अगले दिन उनके पिता पुलिस के साथ आए, जिसके बाद वह बाहर निकलीं। इससे यह साबित नहीं होता कि पति ने उन्हें बंदी बनाया था।
अदालत ने मेडिकल रिकॉर्ड का भी हवाला दिया और कहा कि उपलब्ध दस्तावेजों से ऐसा कोई व्यवहार साबित नहीं होता जो महिला को आत्महत्या के लिए मजबूर करे या उसके जीवन, स्वास्थ्य या शरीर को गंभीर खतरे में डाले। इसलिए बीएनएस की धारा 85 के तहत क्रूरता का मामला नहीं बनता।
इन सभी तथ्यों के आधार पर पटना हाईकोर्ट ने पति के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि तलाक, बच्चों की कस्टडी और घरेलू हिंसा से जुड़े अन्य मामले अलग-अलग अदालतों में अपने गुण-दोष के आधार पर चलते रहेंगे।