पटना न्यूज डेस्क: पटना हाईकोर्ट ने कैदियों की सजा में छूट यानी रिमिशन और समय से पहले रिहाई की प्रक्रिया को ज्यादा पारदर्शी और आसान बनाने के लिए कई अहम निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने कहा है कि इस प्रक्रिया में अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए और पात्र कैदियों के मामलों पर तय समयसीमा के भीतर फैसला लिया जाना चाहिए। कोर्ट के ये निर्देश बिहार जेल मैनुअल 2012 में रिमिशन से जुड़े प्रावधानों की समीक्षा के बाद सामने आए हैं।
18 सितंबर को दिए गए फैसले में जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की खंडपीठ ने उम्रकैद की सजा काट रहे कैदियों के मामलों को लेकर भी समयसीमा तय करने की बात कही। कोर्ट के मुताबिक, जब कोई उम्रकैद का कैदी निर्धारित अवधि की वास्तविक हिरासत पूरी कर लेता है, तो उसके समय से पहले रिहाई के मामले पर तय समय के भीतर फैसला होना चाहिए। इससे कैदियों को अपने मामले की स्थिति जानने और अनिश्चित इंतजार से बचने में मदद मिलेगी।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर किसी कैदी को पहले ही रिमिशन यानी सजा में छूट दी जा चुकी है और बाद में उसे वापस लेने का फैसला किया जाता है, तो कैदी को अपना पक्ष रखने का मौका मिलना चाहिए। कोर्ट ने रिमिशन की प्रक्रिया में पारदर्शिता, समय पर निर्णय और शिकायतों के निपटारे को जरूरी बताया है।
यह मामला सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद स्वत: संज्ञान से शुरू हुआ था। सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी और राज्य सरकार की ओर से दिए गए सुझावों पर भी विचार किया गया। हाईकोर्ट ने कहा कि पारदर्शिता, समयसीमा और शिकायतों के समाधान से जुड़ी चिंताओं को इन सुझावों से काफी हद तक दूर किया जा सकता है और इन्हीं को आगे निर्देश के रूप में अपनाया गया है।