पटना न्यूज डेस्क: बिहार के हजारों जमीन मालिकों के लिए राहत भरे एक महत्वपूर्ण फैसले में पटना हाईकोर्ट ने राज्य सरकार द्वारा वर्षों पुरानी जमाबंदी रद्द करने की प्रक्रिया पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने इसे "मनमाना" और स्थापित कानूनी सिद्धांतों के विपरीत बताया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि कोई जमाबंदी 30 वर्ष से अधिक समय से राजस्व अभिलेखों में दर्ज है, तो उसे राजस्व अधिकारी अपने स्तर पर रद्द नहीं कर सकते।
यह फैसला न्यायमूर्ति सौरेंद्र पांडेय की एकल पीठ ने कृष्ण कुमार गोयनका की याचिका पर सुनाया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता सुमीत कुमार सिंह ने बताया कि गोयनका परिवार पिछले 60 वर्षों से जमुई जिले के खैरा अंचल स्थित अपनी पैतृक भूमि का नियमित लगान सरकार को जमा करता आ रहा है। इसके बावजूद अंचल अधिकारी ने अचानक लगान लेना बंद कर दिया और बाद में वर्षों पुरानी जमाबंदी भी रद्द कर दी।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राजस्व अधिकारियों के रवैये पर नाराजगी जताते हुए कहा कि वे लगातार अदालत के पूर्व फैसलों की अनदेखी कर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर आदेश पारित कर रहे हैं। कोर्ट ने कहा कि यदि सरकार किसी पुरानी जमाबंदी को अवैध मानती है, तो उसे पहले सक्षम सिविल कोर्ट से आदेश प्राप्त करना होगा। केवल राजस्व अधिकारी अपने स्तर पर ऐसी जमाबंदी को निरस्त नहीं कर सकते।
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को राहत देते हुए संबंधित राजस्व अधिकारियों को तत्काल उनकी जमीन का लगान स्वीकार करने और विधिवत रसीद जारी करने का निर्देश दिया। माना जा रहा है कि यह फैसला बिहार में दशकों पुरानी जमाबंदी वाले हजारों भूमि स्वामियों के लिए महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल साबित हो सकता है।